Why Indian Air Force chose Rafale: भारतीय वायुसेना अब 114 राफेल खरीदने जा रही है. ऐसें में कईयों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब दुनियां में पांचवीं पीढ़ी का फाइटर मौजूद है तो भारत ने फ्रांस से आखिरकार 4.5 पीढ़ी का लड़ाकू विमान खरीदने का फैसला क्यों लिया.ये डील इतनी बड़ी है कि इसे मदर ऑफ आल डिफेंस डील भी कहा जा कहा है. इसकी अमुमानित लागत करीब 3.25 करोड़ मानी जा रही है. इसके तहत 18 विमान सीधे फ्रांस से फ्लाई वे कंडीनशन में आयेंगे और बाकी के 96 विमान मेक इन इंडिया के तहत भारत में ही बनेंगे.
Why Indian Air Force chose Rafale
आखिर राफेल ही क्यों बनी पहली पसंद?
कहा जा रहा है कि 114 लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए भारतीय वायुसेना के सामने कई विकल्प मौजूद थे. इस लिस्ट में अमेरिका से F-16 या F-18 लेना, स्वीडन से ग्रिपेन लेना, यूरोफाइटर टाइफून और रूस का Su-35 जैसे फाइटर जेट्स भी शामिल थे. राफेल पर सहमति बनने से पहले अलग-अलग देशों के मल्टीरोल फाइटर जेट्स पर विचार किया गया. लेकिन आखिरकार राफेल सबसे आगे निकलकर आया. इसके पीछे कई रणनीतिक तो कई ऑपरेशनल कारण भी हैं.
युद्ध में साबित ट्रैक रिकॉर्ड
राफेल का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है उसका कॉम्बैट एक्सपीरियंस. माने ये एक मंझा हुआ खिलाड़ी है. नाटो के मिशंस में इस विमान ने खुद को साबित किया है. इसने ISIS के खिलाफ, अफगानिस्तान में मिशन के दौरान और अफ्रीका के ऑपरेशनों में भरोसेमंद प्रदर्शन किया है. यही वजह है कि इस विमान को चुना गया. क्योंकि फीचर्स होना एक अलग बात है, लेकिन बैटल टेस्टेड होना सबसे बड़ा फैक्टर है.
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मल्टीरोल क्षमता भी है खूबी
राफेल को 4.5 जेनरेशन का 'ओम्नी-रोल' फाइटर कहा जाता है. ओम्नी-रोल माने ये एक ही उड़ान में यह विमान कई भूमिकाएं निभा सकता है. जैसे एयर डिफेंस करना, ग्राउंड अटैक या एयर स्ट्राइक करना, जमीनी सैनिकों को एयर सपोर्ट देना, निगरानी करना और समुद्र में ऑपरेट करना. यही वजह है कि डील के 114 विमानों के अलावा भारत ने राफेल के 26 मरीन वर्जन विमानों की भी डील की है. इसके बेड़े में शामिल होने से मिशन बदलने के साथ बार-बार प्लेटफॉर्म यानी विमान बदलने की जरूरत नहीं होगी. यही लचीलापन इसे 'Airforce's Favourite' बनाता है.
एक और कारण है जिससे भारत ने राफेल को चुना. ये है ऑपरेशन सिंदूर का अनुभव. इस दौरान राफेल ने आतंकी कैंप्स पर सटीक हमले किए थे. इस अनुभव ने एयरफोर्स के भीतर इसके प्रति भरोसा और मजबूत किया. जब कोई विमान रियल लड़ाई में अपनी उपयोगिता साबित कर देता है, तो भविष्य की खरीद में उसे प्राथमिकता मिलना स्वाभाविक है.
साथ ही भारत की फ्लीट में पहले से 36 राफेल मौजूद हैं. यानी हमारे पायलट्स इसके लिए प्रशिक्षित हैं. ग्राउंड क्रू को भी इसका अनुभव है. स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस इंफ्रास्ट्रक्चर के अलावा लॉजिस्टिक्स चेन पहले से है. इसीलिए कोई नए विमान लाने की बजाए, पहले से मौजूद राफेल के बेड़े को बढ़ाना आसान भी है, और किफायती भी.इस विमान को भारत के अलावा फ्रांस, मिस्र, कतर, ग्रीस, क्रोएशिया, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात भी इस्तेमाल कर रहे हैं. लिहाजा इसने कई देशों में अपना भरोसा कायम किया है.
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स्क्वाड्रन की घटती संख्या
इंडियन एयरफोर्स की जरूरतों को देखते हुए 42 स्क्वाड्रन की संख्या स्वीकृत है. एक स्क्वाड्रन में 16-18 विमान होते हैं. विमानों के टाइप के हिसाब से ये संख्या 20 तक जा सकती है. सितंबर 2025 में जैसे ही मिग-21 रिटायर हुए, इंडियन एयरफोर्स में अब मात्र 29 स्क्वाड्रन रह गए हैं. ये एयरफोर्स के लिए आजतक की सबसे कम संख्या होगी जिसे पूरा करने के लिए इंडियन एयरफोर्स तेजस का ऑर्डर दे रही है. वहीं दूसरी तरफ पड़ोसी पाकिस्तान को देखें तो स्क्वाड्रन के मामले में वो अब भारत से बहुत ज्यादा पीछे नहीं है. पाकिस्तान एयरफोर्स फिलहाल 25 स्क्वाड्रन के साथ ऑपरेट कर रही है. वहीं ड्रैगन यानी चीन की एयरफोर्स में स्क्वाड्रन की संख्या भारत से चार गुना अधिक है.
फिलहाल HAL के पास 180 LCA तेजस के ऑर्डर हैं. इनमें मार्क 1 और मार्क 1A वेरिएंट्स के ऑर्डर शामिल हैं. लेकिन इनकी डिलीवरी में हुई देरी से एयरफोर्स चिंतित है. अभी मात्र 40 तेजस एयरफोर्स में ऑपरेट कर रहे हैं. अगर ये विमान समय पर मिलते तो आज मिग-21 के रिटायर होने के बावजूद एयरफोर्स के पास संख्या के मामले में पर्याप्त जेट होते.
अगर खासियत की बात करें तो राफेल की सबसे बड़ी ताकत मेटियोर जैसे मिसाइल है. यह हवा से हवा में 150 से 200 किलोमीटर तक मार कर सकती है. वहीं स्कैल्प मिसाइल भी युद्ध में अपना लोहा मनवा चुकी है. ये करीब 1300 किलोग्राम पे लोड के साथ 350 किलोमीटर तक मार कर सकती है. साथ ही मध्यम दूरी तक मार करने वाली हैमर हवा से जमीन में मार करने वाली मिसाइल है. यह बंकर समेत सैन्य ठिकाने आसानी से नष्ट कर सकता है. यह कम ऊंचाई और पहाड़ी इलाकों में काफी असरदार है.राफेल की रफ्तार करीब दो हजार किलोमीटर प्रतिघंटा है. इसकी रेंज करीब 3700 किलोमीटर है. यही वजह है कि सीरिया और मिडिल ईस्ट में ISIS के खिलाफ राफेल ने शानदार प्रदर्शन किया था.
कीमत भी बड़ा फैक्टर है
किसी भी रक्षा डील में कीमत एक बड़ा फैक्टर होता है. अगर कीमत के मामले में देखें, तो राफेल अपने बाकी प्रतिद्वंदियों से बेहतर है.तुर्किये ने 20 यूरोफाइटर विमान लगभग 7 अरब यूरो में खरीदे, जबकि जर्मनी ने 20 विमान 3.75 अरब यूरो में लिए. इटली ने भी 20 यूरोफाइटर विमान 7.5 अरब यूरो में खरीदे थे.सूत्रों के अनुसार औसतन एक यूरोफाइटर की कीमत 120 से 150 मिलियन यूरो होती है और हथियार व अन्य उपकरण जोड़ने पर यह लागत बढ़कर लगभग 250 मिलियन यूरो प्रति विमान यानी लगभग 2700 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है. और भारत के पास राफेल का अनुभव पहले से है. इसलिए यूरोपियन जेट की जगह राफेल को तरजीह दी गई.
भारत की राफेल सौदे की शुरुआती लागत 18 अरब डॉलर आंकी गई थी, लेकिन अब यह बढ़कर 35.84 अरब डॉलर यानी लगभग 3.20 लाख करोड़ रुपये होने की संभावना है.भारत और फ्रांस को उम्मीद है कि फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की प्रस्तावित बैठक के दौरान इस सौदे को अंतिम रूप दिये जाने की संभावना है.114 लडाकू विमानों के इस सौदे में राफेल लड़ाकू विमान के चयन करने की सबसे बड़ी वजह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उसका शानदार प्रदर्शन रहा. इस दौरान राफेल ने पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. दूसरी बड़ा कारण यह रहा कि वायु सेवा पहले से ही 36 राफेल लड़ाकू विमान उड़ा रही है जबकि नौसेना ने भी 26 राफेल के समुद्री संस्करण का आर्डर दिया हैं.
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